Project Gurukul
अतिथि कौन? वेदों में कहा गया है कि अतिथि देवो भव: अर्थात अतिथि देवतास्वरूप होता है। अतिथि के लक्षणों का वर्णन करते हुए महर्षि शातातप (लघुशाता 55) कहते हैं कि जो सज्जन बिना किसी प्रयोजन, बिना बुलाए, किसी भी समय और किसी भी स्थान से घर में उपस्थित हो जाए, उसे अतिथिरूपी देव ही समझना चाहिए। सूतजी के कथनानुसार अतिथि की सेवा-सत्कार से बढ़कर कोई अन्य महान कार्य नहीं है। महाभारत के वनपर्व में अतिथि सेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि जो व्यक्ति अतिथि को चरण धोने के जल, पैरों की मालिश के लिए तेल, प्रकाश के लिए दीपक, भोजन के लिए अन्न और रहने के लिए स्थान देते हैं, वे कभी यमद्वार नहीं देखते।
7 episoder
Kommentarer
0Vær den første til at kommentere
Tilmeld dig nu og bliv en del af Project Gurukul-fællesskabet!