Storywala Smrit (स्टोरीवाला स्मृत)

Swatijeet singh ka premkand(स्वाति जीत सिंह का प्रेमकाण्ड)

49 min · 10. apr. 2021
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Beskrivelse

ना जाने कितनी बाते थी, दो खामोश दिलों के दरमियान, जो आज एक दूसरे को खराबा खराबा पास ला रहीं थी। एक दूजे के लिए "मिराक" हो जाना ही शायद प्यार होता है । हर रात फोनिन फरमाइश और रतजग्गा होने लगा और दोनों ने वचन दिया कि, लाइफ सेट होते ही, शादी होगी सरस्वती विद्या मंदिर के लॉन से । समस्त प्रकार की सामाजिक जुनून और पारिवारिक फुटानी झाड़ने के बाद, रात्री का आखरी पहर सहेज के रखा जाता था.. उस सच्ची रूमानियत के लिए, जब दिल आत्मिक हो जाते थे और वहीं बोल पाते थे जो बेहद वास्तविक था। आगे का कालखंड, केवल मालवीय जी के विद्या मंदिर में ही सिमटा नहीं रहा बीएचयू में, स्वाति का ये आखरी और जीत का पहला साल था । स्वाति को अपनी रिसर्च पूरी करने मुबई जाना था और वो चली गयी । दोनों ही जीवन में सिनेमाई लाड नही लड़ाते थे, इसलिए मैं कैसे, या तुम कैसे रहोगी ? इस बात के इमोशनल टंटे नही थे लेकिन दूरियों का साइड इफ़ेक्ट तो जरूर था । कुछ ही दिनों में फ़ोन पे किये प्रेम, सेक्स और चुम्मा चाटि से दिल ऊब गया था। एक रात्रि, जब वासना उफान मार रही थी.. जीत के पुरजोर अपील के बाद, स्वाति ने ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित किया कि इस बार मुबई से लौटते ही कहानी बढ़ेगी टचिंग किसिंग के आगे .........स्वाति को बिसरी बात याद आ रही थी । उसने बचपन और जवानी के बीच में कही जीत को भुला दिया था, जो आज लौट आया था। ना जाने क्यों लौटा और वो भी मेरे इतने आस पास, टेलीस्कोप होता तो छत से उसका हॉस्टल दिख जाता । ह्रदय की अनायास हलचल जीत से मिलने को बेकरार थी।इस बीच भाव भंगिमाओं और मुद्राओं से मन का समाचार समझने वाली स्वाति, सनसनीखेज भावनावो में उलझ के रह गयी थी। आज कॉलेज से लौटते वक़्त बिरला हाउस में जीत को गाते सुना, वो बीती बात को दिल तक ,लगाए लौट आया हूँ। जरा सी बात ही तो थी, बताने लौट आया हूँ।। वो टूटे दिल के टुकड़ो को ,लुटाने लौट आया हूँ।

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Billede af episoden Virah(विरह) by smrit

Virah(विरह) by smrit

नमस्कार मैं स्मृत आज आपके बीच लेकर आया हूं एक कविता एक विरह गीत जिसे सोहर राग से पिरो के लिखने का प्रयास किया है. ताकि हम अपने माडर्न मन मे धसे देहात को देख सके जो कही भुला हुआ है। तो चलिए इस विरह प्रेम कविता को सुनते है। रानी तेरी देखो निष्प्राण पड़ी बीने तेरे देखो झाई, मैं मुरझाई पड़ी तेरी यादों संग कितना रोये है हम दिन रेन जागे खोए जोहे, कितना रोये है हम तेरी खैर ख़बर खोजे पलकें बिछी भर भर अखियन में अश्रु, काजल कागज पत्तर, तोहे प्रेम लिखे मेरा जी, मन, जिया, हिया, घट,बढ़ भी तुम अब तो आवो आ भी जाओ मेरा पूरा अधूरा मेरा शेष भी तुम मेरे अर्पण तर्पण जो दर्पण हो तुम ओ साजन जी दिल के निवासी धकधकाहट हो तुम

8. maj 20213 min
Billede af episoden Pyar ki pathshala(प्यार की पाठशाला).. Yaadein oldschool pyar ki..

Pyar ki pathshala(प्यार की पाठशाला).. Yaadein oldschool pyar ki..

किसी जमाने में कन्या को प्रेम पत्र देना और जान की बाजी लगाने में कोई विशेष अंतर ना था। लेकिन दौर बदला गुलाबी गुलाब, इत्र में डूबा ख़त और 5 रुपया वाला डेरी मिल्क । 90 के दशक तक ये फॉर्मूला माशूक और उसकी सहेली को रिझाने के लिए रामबाण हो गया। उदारवादी दौर में प्यार जैसी अमूल्य चीज भी बहुत सरल और सस्ती हो गई। आज इस कीमत में प्यार तो भूल ही जावो फेसबुक पे माशूक का लोल वाला कमेंट और अँगूठा छाप वाला लाइक मिल जाये वही #हैशटैग बड़ी बात है। सन 2000 के बाद सबकुछ  बदल गया। मोबाईल फोन से बात ही नहीं "इजहार ए मोहब्बत"  करना भी बहुत ही सरल और सुरक्षित हो गया । Mango लovers या आम आशिकों के लिए ये बड़ा ही मिक्स-फ्रूट दौर था। ये उन शुरूआती दिनों की बात है जब मोबाईल फोन आशिकों की जेब में और इंटरनेट उनकी पहुच में आया। इस दौर में आनलाइन फार्म भरने के अलावा लोग दिल्लगी करने भी साइबर कैफे जाने लगे थे। फेस बुक धीरे धीरे आरकुट की जान ले रहा था और प्रेमपत्र देने की रिवायत आखरी सांसे ले रही थी। इसी दौर में क्या तुमने बीएफ देखी है ?और क्या तुम वर्जिन हो? जैसें सवालों ने पहली बार एक लड़की ,जैसी तमाम लड़कियों को झकझोर दिया । क्योंकि इस देश में अब तक, लड़किया या तो विदाउट सेक्स कुंवारी होती थी या फिर  सेक्स करने वाली शादीशुदा आर्दश महिला । बदलाव के इस दौर में लौण्डें पइसा मसक के मोबाईल फोन दनादन खरिद रहे थे तो वही दूर पढ़ाई करने वाली कन्याओं को सुरक्षा की गांरटी मानते हुए मोबाईल फोन बाटा जा रहा था। अब प्यार,अहसास और छुअन के मायने बदल रहे थे और इसी क्रम में इमरान हाशमी, गले की छुअन वाले अहसास को ओठों तक लाने में कामयाब हो पाए । लिपलॉक ,फ्रेच किस और लिपकिस जैसें ,"कानफिडेशियल "शब्द बड़े आराम से बोले और समझे जाने लगे । मेरा जिगरी यार ज्वलंत कहता है कि उस दौर में, यारा सिली-सिली प्यार के नाम से पुरा कोर्स चलाया जा रहा था । सिलसिले-वार तरीके से समझने  की कोशिश करते है  । सुपर सीनियर दीदी ,छोटी बहन और कन्या की परम सखी को केंद्र में रख कर , प्रेम समीकरण बनाये जा रहे थे । प्रेम त्रिकोण भी इसी गणित का एक हिस्सा था जिसको बॉलीवुड वालों ने खूब भुनाया । इसमे फायदा कम था लेकिन नुकसान ना के बराबर था । अमूमन इस दौर में भी लड़किया ,प्रेम जवाब देर से देती थी। काल और साल के बीच आशिक़ ,"हा"या "ना" की  तलाश में एक ही जगह "सिकुड़" के रह जाता था।  दुश्वारियों का अंत  नही था । सालों साल लड़की की हा और ना के बीच लौंडों को जालिम ,"ना "ही सुनने को  मिलती थी। और बहाने भी चिंदीचोर वाले थे। मेरी मम्मी बहुत बीमार है ..अर्थात तुमसे मन भर गया है। पापा लड़का ढूंढ रहे है...अर्थात मेरा मामला कही और सेट है। भइया को पता लग गया है कि मैं तुमसे बात करती हू.. अर्थात ज्यादा उँगली बाजी नहीं हमारे यहां इंटरकास्ट शादी नहीं करते अर्थात संस्कार नाम की कोई चीज है या नहीँ तुम मुझे भूल जावो अर्थात पीछा छोड़ो गुरु और सबसे धांसू मुझे जिंदा देखना चाहते हो तो मुझसे कभी बात मत करना अर्थात कन्या की शादी किसी अच्छे घर में होने वाली है । लौंडों को बिना माल पटाये सीधे सीधे सौदेबाज़ी में लगभक यही हासिल होता था।इसलिए लौंडों में प्यार से पहले माल पटाने की परंपरा का विकास हुआ। ताकि लड़की भविष्य में "ना" भी बोल दे उसे पहले, आप उसके हाथ और कंधे तक पहुच जाते थे। थोड़ी सिरियस और सबकुछ नॉन सिरियस बाते बोल लेते थे। बाइक नचा के उसके साथ बारिश में घूम आये थे । और कई सिनेमाई मौकों पे , चिपक के,  उसके हाथ का पकड़ना और झटकना , दोनों का आनन्द ले चुके थे। ये सबकुछ प्यार के बराबर तो नहीं था ,लेकिन जब दिल टूटे तो जीने का सहारा जरूर था। आगे इसी क्रम को अवरोही क्रम में समझने की कोशिश करगे, लेकिन अगले एपिसोड में। चरण एक - लड़कियो को प्यार से पहले पटाया जा रहा था । शुरुआत लड़की के घर का पता, उसकी प्रिय सहेली और उस छबीले लौंडे की रेकी करने से  होती थी, जो दिन रात स्कूल की लड़कीयों से गप्पीयाता था । सहेली और घर का पता तो ठीक है लेकिन उस छबिले लड़के के विषय में थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करते है। चाल में लचक, आवाज में मासूमियत, चहेरा साफ सुथरा लकड़ियों से रुमाल, टिफिन, किताब और नोटबुक बेधड़क मांग सकता था। लेकिन स्कूल में बाकी लड़कों के साथ सू सू जाने और सामूहिक धार मारने में शर्माता था।  लड़कियों के घर जाने में तनिक भी संकोच नहीं करता था और घर वालों में भी अच्छी पैठ रखता था। ( नोट - मम्मी, दिदी से निकट और घर के मर्दो से थोड़ा सा नरबसाया हुआ ) छिनाल लौण्डों को दूर से ही सूंघ लेता था और उनसे दूर ही रहता था क्योंकि उनकी हरकतों से उसे यौनशोषण की बू आती थी। लगभक हर लड़की लड़के से हसी मजाक और सबके बारे में आशिंक लेकिन

11. apr. 202114 min
Billede af episoden Swatijeet singh ka premkand(स्वाति जीत सिंह का प्रेमकाण्ड)

Swatijeet singh ka premkand(स्वाति जीत सिंह का प्रेमकाण्ड)

ना जाने कितनी बाते थी, दो खामोश दिलों के दरमियान, जो आज एक दूसरे को खराबा खराबा पास ला रहीं थी। एक दूजे के लिए "मिराक" हो जाना ही शायद प्यार होता है । हर रात फोनिन फरमाइश और रतजग्गा होने लगा और दोनों ने वचन दिया कि, लाइफ सेट होते ही, शादी होगी सरस्वती विद्या मंदिर के लॉन से । समस्त प्रकार की सामाजिक जुनून और पारिवारिक फुटानी झाड़ने के बाद, रात्री का आखरी पहर सहेज के रखा जाता था.. उस सच्ची रूमानियत के लिए, जब दिल आत्मिक हो जाते थे और वहीं बोल पाते थे जो बेहद वास्तविक था। आगे का कालखंड, केवल मालवीय जी के विद्या मंदिर में ही सिमटा नहीं रहा बीएचयू में, स्वाति का ये आखरी और जीत का पहला साल था । स्वाति को अपनी रिसर्च पूरी करने मुबई जाना था और वो चली गयी । दोनों ही जीवन में सिनेमाई लाड नही लड़ाते थे, इसलिए मैं कैसे, या तुम कैसे रहोगी ? इस बात के इमोशनल टंटे नही थे लेकिन दूरियों का साइड इफ़ेक्ट तो जरूर था । कुछ ही दिनों में फ़ोन पे किये प्रेम, सेक्स और चुम्मा चाटि से दिल ऊब गया था। एक रात्रि, जब वासना उफान मार रही थी.. जीत के पुरजोर अपील के बाद, स्वाति ने ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित किया कि इस बार मुबई से लौटते ही कहानी बढ़ेगी टचिंग किसिंग के आगे .........स्वाति को बिसरी बात याद आ रही थी । उसने बचपन और जवानी के बीच में कही जीत को भुला दिया था, जो आज लौट आया था। ना जाने क्यों लौटा और वो भी मेरे इतने आस पास, टेलीस्कोप होता तो छत से उसका हॉस्टल दिख जाता । ह्रदय की अनायास हलचल जीत से मिलने को बेकरार थी।इस बीच भाव भंगिमाओं और मुद्राओं से मन का समाचार समझने वाली स्वाति, सनसनीखेज भावनावो में उलझ के रह गयी थी। आज कॉलेज से लौटते वक़्त बिरला हाउस में जीत को गाते सुना, वो बीती बात को दिल तक ,लगाए लौट आया हूँ। जरा सी बात ही तो थी, बताने लौट आया हूँ।। वो टूटे दिल के टुकड़ो को ,लुटाने लौट आया हूँ।

10. apr. 202149 min
Billede af episoden Divorce is new romance

Divorce is new romance

लेडिस बाथरूम के बाहर विचित्र मन से खड़ा ही रहता है कि प्रियम उसे अंदर खिंच के कुंडी लगा देती है। मानो दोनों में कामदेव और रति समा गए हो । दोनों एक दूसरे को चमत्कारी चुंबन करने लगते है प्रियम सारांश को  'किस'  करते हुवे बोलती है कि  तूफान बन गए हो क्या आराम से करो सारांश बोलता है कि पिछले 6 महीने से अकेले रहते रहते अंडकोष में सूजन आ गयी है । बंगाली डॉक्टर बोले है- घड़ा भर गया है जल्दी से जल्दी कही छलका दो वर्ना फुट जाएगा। प्रियम  - तलाक वाला आइडिया किसका था... अब बोलो आ गयी न समस्या । सारांश -अरे, तो तुमने ही तो बोला कि, पांच साल की शादी के बाद हम दोनों ही उजड़ गए है। जवानी में बिजली नही है और प्यार खो गया है। प्रियम-  हा, तो गलत क्या कहा, आज जितनी बेचैनी और पागलपन कहा था पहले । पीहर में बैठ के तुम्हारी याद में घंटो लव लेटर लिखा करती हूँ। मीठी कहानियां, रसभरी कहानियां, और सच्ची मनोहर कहानियां पढ़ने को मन फिर से बेचैन रहता है। सारांश - मेरी जिंदगी की परत दर परत में प्यार छुपा बैठा है, एक बार उखाड़ के देखो प्रियम ,नए लौंडो की तरह आज हम भी तुम्हे पाने के लिए तरसते है । प्रियम - सच में सारांश,आज फिर से मेरे होठों पे तुम्हारी हर धड़कन महसूस हो रही है। सारांश - मेरी रेशम, देखो, तुमसे दूर होकर मैं चिथड़ा हो गया हूं । जी तुम्हे प्यार करने को तरस तरसकर के रह जाता है इस दूरी ने हमारे प्यार को फिर से जिंदा कर दिया है । फिर से तुम्हे फेसबुक पे खोजता रहता हूं। प्रियम- टेंशन मत लो आज प्रोफाइल बना ली है । सर्च करोगे तो प्रियम वाजपेयी फिर मिलेंगी तुम्हे। सारांश -  हा, अब बस तलाक हो जाये फिर 6 महीने तक एक दूसरे से नए इंसानों की तरह मिलेंगे । प्रियम - रात रात भर पागलों की तरह फोनिया जाएगा , मैं तो एक बार फिर से तुम्हें भइया से पिटवा के रहूंगी। सारांश- लेकिन जान कुत्ते की तरह मुझे कूट देता है कमीना प्रियम- ह्म्म्म , मैं फिर घर से भाग जावोंगी । सारांश - हा, फिर से करेंगे शादी और फिर लौटेगा प्यार। प्रियम- अब जल्दी से उठावो मुझे औऱ देखो मेरी साड़ी भी खुल गई। सारांश - ह्म्म्म लो ,तुम्हें उठा के सीधा खड़ा कर दिया। प्रियम- अब अपनी आँखें बड़ी करू मुझे अपना चेहरा ठीक करना है । सारांश- तुम्हे मेरी आँखों मे दिख जाता है कि तुम कैसी लग रही हो। प्रियम- ( प्रियम अपनी साड़ी औऱ बाल ठीक करते हुवे) तुम्हारी आँखों में तो ठीक से नहीं दिखता लेकिन ..... सारांश - लेकिन क्या प्रियम- जब तुम एक टक बिना पलके झपकाए देखते हो न, तो समझ आ जाता है कि मैं अच्छी लग रही हूँ। अचानक बाथरूम का दरवाजा खटखटाया जा रहा है दोनों इस बीच जल्दी जल्दी खुद को ठीक करते है ।  दरवाजा पे देगी शुक्ला है और बल्ली है। तनिक विलम्ब के पश्चात गुप्ता मैंगो शॉप पे दरबार लगाया जाता है गुप्ता की दुकान पे प्रियम और सारांश  बैठे है । मथुरा प्रसाद, बल्ली और देगी रहस्यमयी, अचरज भरी और संदेह की नजरों से क्रमशः प्रियम और सारांश को  देख रहे है । जबरदस्त आलिंगन भरा प्यार और मार पीट करने वाले इंसान अक्सर एक जैसे ही दिखते हैं। प्रियम और सारांश भी कुछ ऐसे लग रहे है, जैसे प्यार नहीं दोनों ने एक दूसरे के साथ झमाझम पिटाई की है। स्वेटर बुनती देगी कहती है, जज साहब इनको एक साथ तो खुला छोड़ना भी खतरनाक है ।

8. apr. 202114 min
Billede af episoden Kitabon mein rakha ishq sa gulab..90 ke dashk ki ek old school love story

Kitabon mein rakha ishq sa gulab..90 ke dashk ki ek old school love story

चुनार में, हर लड़की जो आपसे बड़ी थी, वो आपकी दीदी और बड़े लड़के, भईया थे। आपकी उम्र वाली लड़की, एक शर्त पे दोस्त हो सकती है, अगर उसके मम्मी या पापा, आपके मम्मी या पापा के दोस्त है, लेकिन बहन तो वो भी 100 फीसदी है, चाहे मम्मी पापा दोस्त हो या ना हो, बात साफ, है। मेरी मानिए इस बात पे हैरिसन का ताला भी, लॉक कर दीजिए वर्ना अमिताभ जी चुनार के चार और ऑप्शन बता के बोलेंगे लॉक किया जाए... हाय.....? चुनार के स्कूल में कुछ बातों का चलन पुरातन काल से था,उनमे से एक ये की, ज्यादा तर जूनियर अपने सीनियर्स की पुरानी किताबें मांग कर पढ़ते थे, और दूसरा ये की हर प्रिलिम्स एग्जाम में हमे सीनियर्स के साथ ही एग्जाम देने बैठा दिया जाता । मसलन एक डेस्क पे  क्लास 7th के बालक के साथ, क्लास 8th का बालक,  एक साथ एग्जाम देने बैठता था, । अब डेस्क पे आपके साथ नर सीनियर्स होगा या मादा सीनियर ये भाग्य के गोलमाल पे निर्भर करता था । और यहीं भाग्य आपको एग्जाम में पास भी करा देता, यदि आपके साथ कोई सीनियर दीदी है । दीदी लोग अक्सर पढ़ने में तेज हुआ करती थी, भइया लोग हम जूनियर से ही "बी" कॉपी के बहाने अपना एक दो सवाल चिट पकड़ा के करवाने लगते । कई लड़के तो इसीलिए फेल हो गए क्योंकि उन्हें अपनी कॉपी भरने का टाइम ही नहीं मिला । आगे की कथा विस्तार में, हर साल एग्जाम के बाद हम सारे बच्चे, स्कूल के सीनियर्स लडक़े और लड़कियों के घर पहुच जाते और उनसे किताबें मांगते थे। किताब लेने की एक होड़ सी मच जाती थी, कई बार अगर किताब मांगने में देर कर दी तो, खाली हाथ भी लौटना पड़ता था, क्योंकि फला सीनियर ने अपनी किताब आपके ही दोस्त को दे दी, जिसे आपने ही ये गुप्त सूचना दी थी, कि कल आप पिंटू भईया या मिट्ठू दीदी से किताब मांगने जावोगे । अब कल किसने देखा है, आपका दोस्त तो आपकी नजर में उल्लू है तो उल्लू, उसी रात ही मिठू दीदी से किताब उड़ा ले गया, और आपको अगली सुबह मिलता था, मिठू दीदी का गुरु चेला बना हुआ ठेंगा । आगे इस समस्या से निपटने के लिए हम लोग एग्जाम के बाद अपने किस किस सीनियर्स से किताब मांगने वाले है, इस बात की ख़बर अपने सबसे सच्चे साथी को भी नहीं देते। बड़ा ही अराजकता का माहौल रहता, कुछ चालू चकोर लड़के किताबों के कई सेट सीनियर्स से मांग लेते । दुस्ट चकोर लड़के, हर वक्त चांद जैसे सीनियर्स के पीछे पीछे लगे रहते, किताब के बदले में उन्हें फला भईया का लव लेटर और गुलाब, फला दीदी तक पहुचाना पड़ता, अगर ग्रह नक्षत्र सही हुए तो मामला सेट और एक सब्जेक्ट के दो सेट या एक जोड़ी किताबे हासिल हो जाती थी, क्योंकि एक भईया ने दी, एक दीदी ने । अब ये दो सेट किताबों वाले चकोर, स्कूल खुलते ही किताबो के माफिया बन जाते। ये माफिया किताबों की अवैध तस्करी करते, और किताबे अधिया दाम (half rate) पे बेच देते, बाद में उन पैसों से चूरन, मलाई बर्फ, मलाई पूरी, और आखिर में चिनिया बादाम, काला नमक के साथ खा के पूरे क्लास को बदहजमी और गैस के हिचकोले का हवाई अड्डा बना देते थे ।

8. apr. 202116 min