Storywala Smrit (स्टोरीवाला स्मृत)
ना जाने कितनी बाते थी, दो खामोश दिलों के दरमियान, जो आज एक दूसरे को खराबा खराबा पास ला रहीं थी। एक दूजे के लिए "मिराक" हो जाना ही शायद प्यार होता है । हर रात फोनिन फरमाइश और रतजग्गा होने लगा और दोनों ने वचन दिया कि, लाइफ सेट होते ही, शादी होगी सरस्वती विद्या मंदिर के लॉन से । समस्त प्रकार की सामाजिक जुनून और पारिवारिक फुटानी झाड़ने के बाद, रात्री का आखरी पहर सहेज के रखा जाता था.. उस सच्ची रूमानियत के लिए, जब दिल आत्मिक हो जाते थे और वहीं बोल पाते थे जो बेहद वास्तविक था। आगे का कालखंड, केवल मालवीय जी के विद्या मंदिर में ही सिमटा नहीं रहा बीएचयू में, स्वाति का ये आखरी और जीत का पहला साल था । स्वाति को अपनी रिसर्च पूरी करने मुबई जाना था और वो चली गयी । दोनों ही जीवन में सिनेमाई लाड नही लड़ाते थे, इसलिए मैं कैसे, या तुम कैसे रहोगी ? इस बात के इमोशनल टंटे नही थे लेकिन दूरियों का साइड इफ़ेक्ट तो जरूर था । कुछ ही दिनों में फ़ोन पे किये प्रेम, सेक्स और चुम्मा चाटि से दिल ऊब गया था। एक रात्रि, जब वासना उफान मार रही थी.. जीत के पुरजोर अपील के बाद, स्वाति ने ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित किया कि इस बार मुबई से लौटते ही कहानी बढ़ेगी टचिंग किसिंग के आगे .........स्वाति को बिसरी बात याद आ रही थी । उसने बचपन और जवानी के बीच में कही जीत को भुला दिया था, जो आज लौट आया था। ना जाने क्यों लौटा और वो भी मेरे इतने आस पास, टेलीस्कोप होता तो छत से उसका हॉस्टल दिख जाता । ह्रदय की अनायास हलचल जीत से मिलने को बेकरार थी।इस बीच भाव भंगिमाओं और मुद्राओं से मन का समाचार समझने वाली स्वाति, सनसनीखेज भावनावो में उलझ के रह गयी थी। आज कॉलेज से लौटते वक़्त बिरला हाउस में जीत को गाते सुना, वो बीती बात को दिल तक ,लगाए लौट आया हूँ। जरा सी बात ही तो थी, बताने लौट आया हूँ।। वो टूटे दिल के टुकड़ो को ,लुटाने लौट आया हूँ।
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