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Lisää Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
209. अनासक्ति की कुल्हाड़ी
श्रीकृष्ण ने जीवन के उल्टे वृक्ष की बात की, जहाँ मनुष्य नीचे की ओर लटकती कर्म रूपी जड़ों से बंधा हुआ है। श्रीकृष्ण हमें तुरंत इस बन्धन से मुक्त होने के लिए 'अनासक्ति की कुल्हाड़ी' का प्रयोग करने की सलाह देते हैं (15.3)। अनासक्ति भगवद्गीता के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। श्रीकृष्ण ने कईअवसरों पर इस शिक्षा का उल्लेख किया है। मोटे तौर पर, हम लोगों, वस्तुओं, भावनाओं, विचारों और विश्वासों से आसक्त होते हैं। हमारी कई मान्यताएँ अवैज्ञानिक मिथकों, तर्कहीन मान्यताओं या अपुष्ट सूचनाओं पर आधारित होती हैं। एक अच्छा शिक्षार्थी बनने के लिए श्रीकृष्ण के द्वारा बताए गए 'प्रश्न पूछने' के गुण को विकसित करके, व्यक्ति उनसे अनासक्ति प्राप्त कर सकता है (4.34)। जबकि हमें अनासक्ति के बारे में बताया जाता है, हम विरक्ति यायहाँ तक कि घृणा की ओर आकर्षित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण ने हमेंस्पष्ट रूप से घृणा त्यागने के लिए कहा है। हमें आसक्ति से छुटकारा पाना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि यह लंबे समय से हमारे द्वारा पोषित की गई है और यह हमारा एक हिस्सा बन जाती है। इसका मूल संदेश यह है कि आसक्ति को त्यागना है, लेकिन वस्तुओं और संबंधों को तोड़ना नहीं है। वास्तव में, इसका अर्थ है किसी भी परिस्थिति में आसक्ति के बिना अपना सर्वश्रेष्ठ करना। श्रीकृष्ण कहते हैं, "इस अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का वास्तविक स्वरूप, इसका आदि, इसका अंत और इसकी निरंतरता के रूप - इनमें से कुछ भी सामान्य मनुष्य नहीं समझ सकता। अनासक्ति की प्रबल कुल्हाड़ी से इसे काटकर इस वृक्ष के मूल को खोजना चाहिए, जो कि परमेश्वर हैं, जिनसे बहुत समय पहले ब्रह्माण्ड की गतिविधियाँ प्रवाहित हुई थीं। उनकी शरण में आने पर, मनुष्य इससंसार में पुनः नहीं लौटेगा" (15.3 और 15.4)। एक बार जब कोई अनासक्ति की कुल्हाड़ी से लैस हो जाता है, तो वृक्ष के मूल अर्थात् परमात्मा की खोज शुरू हो जाती है।
208. जीवन का उल्टा वृक्ष
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का प्रारम्भ उल्टे जीवन वृक्ष का वर्णन करते हुए कहते हैं, "ज्ञानी लोग एक शाश्वत अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष की चर्चा करते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर और शाखाएँ नीचे की ओर होती हैं, और जिसके पत्ते वेदों के मंत्र हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वास्तव में वेदों का ज्ञाता है (15.1)। तीनों गुणों से पोषित, इस वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे की ओर फैली हुई हैं; इसकी कोमल कोपलें इंद्रिय विषय हैं; इसकी जड़ें नीचे की ओर फैली हुई हैं, जो मनुष्यों को कर्म से बाँधती हैं" (15.2)। सबसे पहले, जो लोग इस वृक्ष को जानते हैं, उन्हें वेदों का ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। एक संभावित व्याख्या यह है कि वेदों द्वारा प्रस्तुत ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उन्हें पढ़ने का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। एक बार जब इस जीवन-वृक्ष को अस्तित्वगत स्तर पर समझ लिया जाता है, तो वही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। दूसरे, अश्वत्थ का अर्थ है ‘वह जो कल भी एक सा नहीं रहता।’ लेकिन वृक्षको शाश्वत बताया गया है। यह कुछ विरोधाभासी प्रतीत होता है, जैसे प्रकाश का तरंग–कण द्वैत (wave–particle duality) का विरोधाभास। मूलतः, वृक्ष शाश्वत और परिवर्तन दोनों का मिश्रण है। आगे के श्लोकों में और स्पष्टता आएगी। अंततः, यह रूपक हमें अपने आस-पास की दुनिया के बारे में अपनीसोच को बदलने में मदद करेगा। हमारे विचार में प्रगति का अर्थ है शक्ति और प्रसिद्धि के मामले में कुछ उच्चतर प्राप्त करना; अधिक संपत्ति प्राप्त करना।हम आध्यात्मिक प्रगति के बारे में भी ऐसा ही सोचते हैं। यह रूपक इंगित करता है कि उच्च आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ है जड़ों की ओर लौटना। यह त्यागने के बारे में है न कि प्राप्त करने के बारे में; यह हमारे जीवन के दौरान बने तंत्रिका प्रतिरूपों को तोड़ने जैसा है; यह एक नमक की गुड़िया की तरह है जो समुद्र के साथ एक होने के लिए खुद को विलीन कर रही है। मूलतः, हमें उस धूल को हटाना है जो हमने लंबे समय से जमा की है।
207. एकनिष्ठ भक्ति
भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग’ कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनंदस्वरूप है” (14.27)। श्रीकृष्ण 'व्यभिचारेण' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अनेक इच्छाएँ। 'अव्यभिचारेण भक्ति' एकनिष्ठ भक्ति है। इसी संदर्भ में, श्रीकृष्ण ने इसे इंगित करने के लिए 'अवेश्य' का प्रयोग किया (12.2)। मूलतः, यह अनेक मनों से परे होकर ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति है जो हमें गुणातीत बना देगा। सबसे पहले, गुणातीत यह समझकर कर्तापन का भाव त्याग देता है कि किसी भी कर्म का कोई कर्ता नहीं है और सभी कर्म विभिन्न गुणों के परस्पर प्रक्रिया का परिणाम हैं। दूसरे, उसे यह बोध हो जाता है कि दूसरे भी अपने द्वारा किए गए किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वह सम्मान या अपमान से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि दोनों ही गुणों की परस्पर क्रिया है, जिसका परिणाम शत्रुता का त्याग है। अंततः, उसे यह बोध होता है कि सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सुखद और अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। अतः, वह अब ऐसीपरिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार, वह प्रशंसा और आलोचना से भी प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि ये गुणों के कारणहोते हैं। गुणातीत की यह अवस्था आनंद की अवस्था है और यही हम सभी के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।
206. गुणातीत का आचरण
श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं; और जिन्होंने कर्तापन के सभी मोहों को त्याग दिया है - वे तीनोंगुणों से ऊपर उठ गए हैं" (14.24 और 14.25)। संकेत यह है कि गुणातीत समदर्शी होने के साथ-साथ द्वन्द्वातीत भी है। जब इन्द्रियाँ इंद्रिय विषयों से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण ने पहले सलाह दी थी कि इन्हें अनदेखा करना सीखें क्योंकि ये क्षणिक हैं (2.14)। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि द्वंद्व न केवल क्षणिक होते हैं बल्कि समय के साथ अपना स्वभाव भी बदलते हैं। विवाह का सुख तलाक के दुःख में बदल सकता है; एक मित्र शत्रु में बदल सकता है। जब हम अच्छे और बुरे; सुखद और अप्रिय द्वंद्वों का सामना करते हैं, उस समय समभाव बनाए रखना है। जबकि घटनाएं प्रकृति में घटित होती हैं, हम उन्हें सुखद या दुःखद परिस्थितियों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हम दूसरों के शब्दों को प्रशंसा या आलोचना के रूप में ग्रहण करते हैं, और परिवार तथा कार्यस्थल में अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रशंसा और आलोचना - दोनों को साधन के रूप में उपयोग करते हैं। मूलतः, यह अपनी व्याख्याओं और मान्यताओं को त्यागने के बारे में है। भगवद्गीता प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पाठ्यपुस्तक है। ये श्लोक शुरुआती बच्चों के लिए भी समझने में बहुत आसान हैं। परंतु मूल बात यह है कि हम प्रत्येक परिस्थिति का विश्लेषण करके, और उन पूर्व अनुभवों पर मनन करके - जब हम प्रशंसा या आलोचना, सम्मान या अपमान से प्रभावित हुए थे - इन अंतर्दृष्टियों को अस्तित्वगत स्तर पर आत्मसात करें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति को श्रीकृष्ण की लीला के रूप में देखना चाहिए।
205. गुण- दासता से प्रभुत्व तक
यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)। श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म, और तमोगुण से उत्पन्न मोह के उपस्थित होने पर उनसे घृणा नहीं करते और अनुपस्थित होने पर उनकी लालसा नहीं करते (14.22)। वे उदासीन रहते हैं, गुणों से विचलित नहीं होते; वे यह जानकर कि सृष्टि में केवल गुण ही कार्यरत हैं, आत्मा में दृढ़ और केंद्रित रहते हैं” (14.23)। यह न तो गुणों की किसी भी अभिव्यक्ति के साथ लगाव (राग या आसक्ति) है और न ही वैराग्य (विराग या विरक्ति) है। श्रीकृष्ण ने ऐसी शाश्वत स्थिति का वर्णन करने के लिए वीतराग या अनासक्ति का उपयोग किया था। दूसरे, ऐसीपरिस्थिति में, श्रीकृष्ण ने इससे पहले हमें घृणा का त्याग करने की सलाह दी थी, लेकिन कर्म का नहीं। तीसरा, यह गुणों को अपना दास बनाने के बारे में है। जब हमें सोने की आवश्यकता हो, तो तमोगुण का आह्वान करें; जब हमें कोई कार्य करना हो, तो रजोगुण का उपयोग करें; सीखने के लिए सत्वगुण का प्रयोग करें। यह दासता की अवस्था से गुणों के प्रभुत्व की ओर बढ़ना है। उस अवस्था में, व्यक्ति को यह बोध होता है कि इन तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है। इन तीनों के बीच की परस्पर क्रिया ही कर्म का कारण बनती है,लेकिन यह हमारे या किसी और के कारण नहीं होता। एक मार्ग है कर्म को कर्मफल से अलग करना, यह समझकर कि कर्मफल कई कारकों पर निर्भर करता है। दूसरा है कर्ता को कर्म से अलग करना,यह समझकर कि तीनों गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। दोनों ही मार्ग निर्-अहंकार (मैं कर्ता हूँ की भावना से मुक्ति) की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं में केंद्रित होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आत्मरमण या नित्यतृप्त (सदैवसंतुष्ट) कहा है।
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