श्रीमद भागवद पुराण

हनुमान जी की पूर्ण कृपा के लिए केवल एक काम करें। श्री शिव चालीसा।

4 min · 21. helmi 2023
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https://shrimadbhagwadmahapuran.blogspot.com/2022/11/shreeshivchalisa.html श्री शिव चालीसा / चालीसा दोहा अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार।। 1।। आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति-मुक्ति-दातार। करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार।। 2।। पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार।। 3।। पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। ढरौ तुरंत स्वभाववश, नेक न करौ अबार।। 4।। जय शिव शंकर औढरदानी। जय गिरितनया मातु भवानी ।। 1 ।। सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर।। 2 ।। सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता।। 3 ।। पराशक्ति-पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति।। 4 ।। सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमा में स्थितरत।। 5 ।। अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुंजगभूषण चन्द्रमुकुटधर।। 6 ।। वृष वाहन नंदी गणनायक। अखिल विश्व के भाग्य विधायक।। 7 ।। व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर।। 8 ।। कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत।। 9 ।। तनु कर्पूर-गौर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम।। 10 ।। भाल त्रिपुण्ड मुण्डमालाधर। गल रूद्राक्ष-माल शोभाकर।। 11 ।। विधि-हरी-रूद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी।। 12 ।। तुम हो नित्य दया के सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर।। 13 ।। अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सब के मंगलकारी।। 14 ।। सती-पार्वती के प्राणेश्वर। स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर।। 15 ।। हरि-हर एक रूप गुणशीला। करत स्वामि-सेवक की लीला।। 16 ।। रहते दोउ पूजत पूजवावत। पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत।। 17 ।। मारूति बन हरि-सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही।। 18 ।। जग-हित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकण्ठ वर।। 19 ।। असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर।। 20 ।। ‘नमः शिवायः’ मंत्र पंचाक्षर। जपत मिटत सब क्लेश भयंकर।। 21 ।। जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परमहित।। 22 ।। श्रीकृष्ण तप कीन्हो भारी। भये प्रसन्न वर दियो पुरारी।। 23 ।। अर्जुन संग लड़े किरात बन। दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन।। 24 ।। भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे।। 25 ।। शंखचूड़ जालंधर मारे। दैत्य असंख्य प्राण हर तारे।। 26 ।। अन्धक को गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों।। 27 ।। तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति गति कीन्हीं।। 28 ।। अष्टमुर्ति पंचानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्मय।। 29 ।। भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा।। 30 ।। काशी मरत जंतु अवलोकी। देत मुक्ति पद करत अशोकी।। 31 ।। भक्त भगीरथ की रूचि राखी। जटा बसी गंगा सुर साखी।। 32 ।। रूरू अगस्तय उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी।। 33 ।। शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। शिवहिं परमप्रिय लोकोद्धारक।। 34 ।। इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित हृै अति दुर्लभ वर।। 35 ।। अति उदार करूणावरूणालय। हरण दैन्य-दारिद्र्य-दुःख-भय।। 36 ।। तुम्हरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी।। 37 ।। बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलभ्य शिवपद को पावहिं।। 38 ।। भेदशून्य तुम सब के स्वामी। सहज-सुहृद सेवक अनुगामी।। 39 ।। जो जन शरण तुम्हारी आवण। सकल दुरित तत्काल नशावत।। 40 ।। दोहा बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। गनौ न अघ, अघ जाति कछु, सब विधि करौ संभार।।1।। तुम्हरो शील स्वाभव लखि, जो न शरण तव होय। तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नही कुभाग्य जन कोय।।2।। दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करौ पाप सब क्षार।।3।। कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करौ पवित्र। राखौ पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र।।4।।

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https://dharma-basics.blogspot.com/2021/07/blog-post_27.html https://dharma-basics.blogspot.com/2021/07/blog-post_15.html https://dharma-basics.blogspot.com/2021/07/blog-post_57.html तांत्रिक यानी शरीर वैज्ञानिक।।तंत्रिका कोशिका।। तंत्र क्या है!तंत्र--एक कदम और आगे। नाभि से जुड़ा हुआ एक आत्ममुग्ध तांत्रिक। तंत्र कहते ही तांत्रिक मन में आता है, एक अर्ध पागल सा बड़बड़ाता हुआ व्यक्ति। तंत्र का मतलब होता है व्यवस्था, तंत्रिका तंत्र,गणतंत्र, लोकतंत्र, स्नायु तंत्र, तो यहां जो बात हो रही है वह है शरीर विज्ञान की।  साथ में आत्मा भी, क्योंकि ज्ञान का बोध करने वाली तो वही है न बन्धु। एक मित्र है  वे आज पूछ रहे थे कि जग्गी वासुदेव कहते हैं शरीर मरने के 3-4 घण्टे बाद तक भी शरीर में व्यान प्राण रहता है, मरने के 12-13 घण्टे बाद भी उदान प्राण रहता है, अगर सही से तांत्रिक क्रियाएं की जाएं तो व्यक्ति को जीवित किया जा सकता है,,आपकी क्या राय है??  कोई क्या कहते हैं और किस आधार पर ये वे खुद जानें, मैं सिर्फ ऋषियों पर भरोसा करता हूँ या ऋषिकृत शास्त्रों पर। अपने पूर्वज ऋषियों ने कुछ अलग ही बताया है, महर्षि योगसूत्रों में कह रहे हैं-- नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम--नाभिचक्र में ध्यान लगाने से योगी शरीर संरचना को भली भांति जान लेता है,,   नाभि में जो चक्र है उसका नाम है मणिपुर चक्र, कपालभाति जो क्रिया है वह उसी को तो सबसे ज्यादा जल्दी एक्टिवेट करती है जिसे आजकल बाज़ार में कुंडलिनी जागरण के नाम से बेचा जा रहा है, खैर अपना विषय अलग है। मैंने सैकड़ों स्कूल कालेजों में बच्चों से पूछा है,, तथाकथित तांत्रिकों से भी, ये बताइए महाराज शरीर में कितनी चीजें हैं जो धड़कती हैं, बताने वाले सबसे पहले हृदय बताते हैं, फिर नाड़ी बताते हैं। हाथ की जिसे नस भी कह दे रहे हैं, लेकिन नाड़ी तो रक्त और हृदय के आधार पर धड़कती है उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, फिर और क्या है जो धड़कता है?? इस बात पर तांत्रिक महोदय गांजे की चिलम खींचकर मुझे घूरने के अलावा कुछ नहीं करते हैं।  दूसरी चीज जो शरीर में धड़कती है वो नाभि है। हरियाणा में उसे धरन भी कहते हैं। गाँव देहात में किसी को पेट में दर्द हो मरोड़ उठ रहे हो तो बड़े बूढ़े कहते हैं धरन दिखा लो, वही डिगी हुई है, नाभि पहला पार्ट है जो मां के गर्भ में आने के बाद हमारे शरीर में बनता है। धड़कन भी उसी में पहले शुरू होती है। लोग उदान प्राण की बात कह रहे हैं जबकि नाभि में जहां से जीवन शुरू होता है वहां अपान प्राण होता है। अब चूंकि जहां से जीवन शुरू हुआ है वहीं जाकर खत्म होगा तभी एक जीवनचक्र पूरा होगा। इसलिए कई बार लोग मर जाते हैं तो श्मशान ले जाते समय या कोई उनपर हाथ पटक पटक कर रोए उस समय या अर्थी को चिता पर रखते समय जीवित हो जाते हैं। कारण मात्र इतना ही है कि प्राण जो सिकुड़कर नाभि में इकट्ठा हो गया था वह किसी झटके से फिर से चालू हो जाता है। पूरे शरीर में जीवन ऐसे फैल जाता है जैसे तारों में बिजली, व्यक्ति जी उठता है।  इसलिए तांत्रिक यानी शरीर विज्ञान को जानने वाला, अगर इसमें सिद्धहस्त है।तो मरे हुए व्यक्ति की हाथ की नाड़ी को नहीं देखेगा, न हृदय को देखेगा, न सांस चल रही है या नहीं, इसको भी नहीं देखेगा, यह बच्चों के काम हैं।   वह देखेगा नाभि को छूकर, अगर वह धड़क रही है, यानी उसमें अभी प्राण हैं तो व्यक्ति को वहां झटका देकर जिंदा किया जा सकता है, इसके सफल होने के प्रतिशत ज्यादा हैं।  यही तंत्र है। शरीर विज्ञान का परम ज्ञाता होना, साथ में आत्मा का भी, भूत प्रेत या झाड़ फूंक वालों को तांत्रिक कहना घोर अज्ञानता है।इसलिए योगी ही असली तांत्रिक हो सकता है। क्योंकि वह शरीर विज्ञान को भली भांति जानता है, या यूं कहें जो तांत्रिक है वह अवश्यमेव योगी होगा ही, वरना जानेगा कैसे। मैं तो बस इतना ही जानता हूँ, बाकि किसी जानकार से पता करोगे तो और अच्छे से समझा पाएगा। ॐ श्री परमात्मने नमः।             *सूर्यदेव*

5. elo 20234 min
jakson हनुमान जी की पूर्ण कृपा के लिए केवल एक काम करें। श्री शिव चालीसा। kansikuva

हनुमान जी की पूर्ण कृपा के लिए केवल एक काम करें। श्री शिव चालीसा।

https://shrimadbhagwadmahapuran.blogspot.com/2022/11/shreeshivchalisa.html श्री शिव चालीसा / चालीसा दोहा अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार। बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार।। 1।। आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति-मुक्ति-दातार। करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार।। 2।। पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार। सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार।। 3।। पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार। ढरौ तुरंत स्वभाववश, नेक न करौ अबार।। 4।। जय शिव शंकर औढरदानी। जय गिरितनया मातु भवानी ।। 1 ।। सर्वोत्तम योगी योगेश्वर। सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर।। 2 ।। सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता। उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता।। 3 ।। पराशक्ति-पति अखिल विश्वपति। परब्रह्म परधाम परमगति।। 4 ।। सर्वातीत अनन्य सर्वगत। निजस्वरूप महिमा में स्थितरत।। 5 ।। अंगभूति-भूषित श्मशानचर। भुंजगभूषण चन्द्रमुकुटधर।। 6 ।। वृष वाहन नंदी गणनायक। अखिल विश्व के भाग्य विधायक।। 7 ।। व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर। रीछचर्म ओढे गिरिजावर।। 8 ।। कर त्रिशूल डमरूवर राजत। अभय वरद मुद्रा शुभ साजत।। 9 ।। तनु कर्पूर-गौर उज्ज्वलतम। पिंगल जटाजूट सिर उत्तम।। 10 ।। भाल त्रिपुण्ड मुण्डमालाधर। गल रूद्राक्ष-माल शोभाकर।। 11 ।। विधि-हरी-रूद्र त्रिविध वपुधारी। बने सृजन-पालन-लयकारी।। 12 ।। तुम हो नित्य दया के सागर। आशुतोष आनन्द-उजागर।। 13 ।। अति दयालु भोले भण्डारी। अग-जग सब के मंगलकारी।। 14 ।। सती-पार्वती के प्राणेश्वर। स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर।। 15 ।। हरि-हर एक रूप गुणशीला। करत स्वामि-सेवक की लीला।। 16 ।। रहते दोउ पूजत पूजवावत। पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत।। 17 ।। मारूति बन हरि-सेवा कीन्ही। रामेश्वर बन सेवा लीन्ही।। 18 ।। जग-हित घोर हलाहल पीकर। बने सदाशिव नीलकण्ठ वर।। 19 ।। असुरासुर शुचि वरद शुभंकर। असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर।। 20 ।। ‘नमः शिवायः’ मंत्र पंचाक्षर। जपत मिटत सब क्लेश भयंकर।। 21 ।। जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित। तिनको शिव अति करत परमहित।। 22 ।। श्रीकृष्ण तप कीन्हो भारी। भये प्रसन्न वर दियो पुरारी।। 23 ।। अर्जुन संग लड़े किरात बन। दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन।। 24 ।। भक्तन के सब कष्ट निवारे। दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे।। 25 ।। शंखचूड़ जालंधर मारे। दैत्य असंख्य प्राण हर तारे।। 26 ।। अन्धक को गणपति पद दीन्हों। शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों।। 27 ।। तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं। बाणासुर गणपति गति कीन्हीं।। 28 ।। अष्टमुर्ति पंचानन चिन्मय। द्वादश ज्योतिर्लिंग ज्योतिर्मय।। 29 ।। भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा। अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा।। 30 ।। काशी मरत जंतु अवलोकी। देत मुक्ति पद करत अशोकी।। 31 ।। भक्त भगीरथ की रूचि राखी। जटा बसी गंगा सुर साखी।। 32 ।। रूरू अगस्तय उपमन्यू ज्ञानी। ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी।। 33 ।। शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक। शिवहिं परमप्रिय लोकोद्धारक।। 34 ।। इनके शुभ सुमिरनतें शंकर। देत मुदित हृै अति दुर्लभ वर।। 35 ।। अति उदार करूणावरूणालय। हरण दैन्य-दारिद्र्य-दुःख-भय।। 36 ।। तुम्हरो भजन परम हितकारी। विप्र शूद्र सब ही अधिकारी।। 37 ।। बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं। ते अलभ्य शिवपद को पावहिं।। 38 ।। भेदशून्य तुम सब के स्वामी। सहज-सुहृद सेवक अनुगामी।। 39 ।। जो जन शरण तुम्हारी आवण। सकल दुरित तत्काल नशावत।। 40 ।। दोहा बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार। गनौ न अघ, अघ जाति कछु, सब विधि करौ संभार।।1।। तुम्हरो शील स्वाभव लखि, जो न शरण तव होय। तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नही कुभाग्य जन कोय।।2।। दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार। कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करौ पाप सब क्षार।।3।। कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करौ पवित्र। राखौ पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र।।4।।

21. helmi 20234 min
jakson Shrimad Bhagwad Mahapuran Mangla charan kansikuva

Shrimad Bhagwad Mahapuran Mangla charan

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12. kesä 20211 min
jakson हिन्दु धर्म में आहार kansikuva

हिन्दु धर्म में आहार

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2. huhti 20211 min