Gurudev Ojaswi Sharma Ji
* बईमानी बिल्कुल नहीं करनी चाहिए * प्रारब्ध तो तय है, परंतु, तुम्हारी नियत, तुम्हारा प्रयत्न, तुम्हारा भाव और प्रारब्ध यह आपस में टकराते हैं
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।। सब के गुरु परमात्मा।|
* सिद्धियों में मत फंस जाना, केवल परमात्मा * इस देश की और संस्कृति की कोई सीमा नहीं है, हर क्षेत्र में हमारे पूर्वजों ने अनेक प्रयोग किये * जिस मार्ग पर चल पड़े फिर उसको पूरा आखिर तक चलो * निषेधात्मक मार्ग से अनुभव होता है, पर इस झंझट में मत पड़ो . 10 minute meditation . * सभी इच्छाओं का अंत दुख में होता है * यदि कोई इच्छा उत्पन्न हो जाए तो उसे दृष्टा भाव से देखो * तुम हो, मैं हु और तुम्हारे चरणों में हु * तुम पक्का रखो के ये आखरी जनम है
।। यहां कुछ गलत नहीं है ।।
* जीवात्मा के विकास में अनेक stages है * धीरे धीरे ये प्रकट होगा कि यहां कुछ भी गलत नहीं हो रहा है * यहां केवल भगवान ही है इस पर आना है * न्यूज में तो अधिकतर नेगेटिव बाते होती हैं * हर किसी के साथ जो हो रहा है - वह सब प्रारब्ध से है * कैसा भी प्रारब्ध आ जाए, आत्मज्ञान के घटने की संभावना हर समय है * हर समय सब प्रकार के लोग होते है * अपने हिस्से में जो कर्तव्य आया है इसको करते रहो, प्रभु का संसार है, बाकी सब वो देख लेंगे * बाधाओं को भी साधन बना लो - तब विकास होता है * प्रार्थना करते रहो - प्रभु इस बार तो पूर्ण कृपा कर दो * सब काम बन जाएगा - जब जन्म ही इस बात के लिए मिला है
।। भगवत प्राप्ति तुरंत।।
।। सात्विक अहंकार ।।
* सात्विकता के अधिक होने का प्रयास करो, परंतु सात्विक प्रधान में " मुझे ज्ञान हो गया " यह भ्रम हो जाता है * गुरु बनने की ललक बड़ी खतरनाक * सात्विकता बढ़ने पर कई सिद्धियाँ आ जाती है * तीन इच्छाएं प्रमुख होती है - करने की जानने की पाने की * त्रिगुणतीत के लिए प्रकृति के गुण प्रभावहीन हो जाते है * समाधि का अर्थ है जिसकी बुद्धि समता में आ जय * समर्पण घटने पर सब बन जाता है
।। आधुनिक भौतिक उन्नति से दुर्गति ।।
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