Gita Acharan
श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुरुष या परमात्मा) कहा जाता है (15.18)। यह पुनरावृत्ति हमें निम्नलिखित श्लोकों को समझने में मदद करेगी। श्रीकृष्ण कहते हैं, “आसुरी स्वभाव वाले लोग कर्म और अकर्म में भेद नहीं कर पाते। उनमें न तो पवित्रता होती है, न आचरण, न सत्य (16.7)। वे कहते हैं कि संसार परम सत्य से रहित है, आधारहीन है, प्रभु से रहित है।यह संसार कामवासना से (स्त्री-पुरुष के) पारस्परिक मिलन से उत्पन्नहुआ है" (16.8)। मूलतः, यह प्रकृति के स्तर पर जीवन जीना है, जहाँ कारण और प्रभाव का प्रभुत्व है; जहाँ तर्क ही हमारे अनुभव की हर चीज को परिभाषित करता है। अगला प्रश्न यह उठता है कि नाशवान प्रकृति के स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति का आचरण कैसा होगा। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऐसे विचारों को धारण करके, ये पथ भ्रष्ट आत्माएँ, अल्प बुद्धि और क्रूर कर्मों के साथ, संसार के शत्रु के रूप में इसके विनाश का कारण बनती हैं(16.9)। अतृप्त कामनाओं को धारण किए, पाखंड, अभिमान और अहंकार से युक्त, मोहवश बुरे विचारों से युक्त, ये अशुद्ध संकल्प से कार्य करते हैं (16.10)। संक्षेप में, आसुरी स्वभाव वाले लोग पुरुषोत्तम को समझे बिना प्रकृति के कारण और प्रभाव के स्तर पर जीते हैं। सृष्टि के लिए नर-नारी के मिलन का रूपक तार्किक है। इसी प्रकार, हमारे आस-पास दिखाई देनेवाले कई कार्य और विचार भी इसी तार्किक श्रेणी में आते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम का शुद्ध आनंद तर्क से परे है। यह तर्क के बन्धन से बिना शर्त प्यार (निःस्वार्थ प्रेम) की यात्रा है।
665 episoder
Kommentarer
0Vær den første til at kommentere
Tilmeld dig nu og bliv en del af Gita Acharan-fællesskabet!