Gita Acharan

229. तप के प्रकार

4 min · 26. juni 2026
episode 229. तप के प्रकार cover

Beskrivelse

तप के प्रकार

Kommentarer

0

Vær den første til at kommentere

Tilmeld dig nu og bliv en del af Gita Acharan-fællesskabet!

Kom i gang

1 måned kun 9 kr.

Derefter 99 kr. / måned · Opsig når som helst.

  • Podcasts kun på Podimo
  • 20 lydbogstimer pr. måned
  • Gratis podcasts

Alle episoder

673 episoder

episode 231. ॐ तत् सत् cover

231. ॐ तत् सत्

भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है। ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन है। यह माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति इसी दिव्य कम्पन ॐ से हुई और विज्ञान भी यह पुष्टि करता है कि सम्पूर्ण पदार्थ निरन्तर कम्पन की अवस्था में रहता है जिसे आवृत्ति (frequency) कहा जाता हैं। ॐ का यह कम्पन तीन अक्षरों -‘अ-उ-म्’ से मिलकर बना है। ‘तत्’ का अर्थ ‘वह’ है। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। सामान्यतः परमात्मा को ‘तुम’ कहकर संबोधित करना सहज लगता है। परंतु जब हम परमात्मा को ‘तुम’ कहते हैं तो ‘मैं’ भी बना रहता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने ‘तत्’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘तत्’ वह अवस्था है जहाँ‘मैं’ और ‘तुम’ दोनों लीन होकर एक हो जाते हैं जैसे नमक की गुड़िया सागर में विलीन होकर स्वयं सागर बन जाती है। यह अस्तित्व के साथ एकाकारहोने की अवस्था का प्रतीक है। वेदांत में इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ‘तत् त्वम् असि’ अर्थात् ‘तुम वही हो’ कहा गया है जो मनुष्य और परमात्मा के बीच एकत्व का बोध कराता है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “इसलिए, दान, तप और यज्ञ जैसे शास्त्रों में निर्दिष्ट सभी कर्मों का आरंभ सदा ‘ॐ’ उच्चारण से किया जाता है (17.24)। जो लोग मुक्ति के इच्छुक हैं और फल की इच्छा नहीं रखते, वे ‘तत्’ का चिंतन करते हुए विविध दान, तप और यज्ञ करते हैं” (17.25)। जहाँ इच्छा या कामना करना ही बन्धन का कारण होता है वहीं इस श्लोक में मोक्ष की इच्छा का उल्लेख किया गया है जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है। पहला चरण भौतिक वस्तुओं की इच्छा है, दूसरा चरण मोक्ष की इच्छा है और अंतिम चरण मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा का भी त्याग करना है। यह एक क्रमिक विकास यात्रा है जैसे प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की प्रगति। श्रीकृष्ण हमें इस धीरे-धीरे होने वाले आंतरिक परिवर्तन में मार्गदर्शन करते हैं।

I går4 min
episode 230. दान के प्रकार cover

230. दान के प्रकार

गुणों के संदर्भ में यज्ञ और तप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण दान के बारे में कहते हैं “जो दान केवल कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, उचित समय और स्थान पर, किसी योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह सात्विक माना जाता है” (17.20)। इस श्लोक में दान के लिए कई प्रकार के निर्देश या नियम निहित हैं। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि योग न तो उस व्यक्ति के लिए है जो बहुत अधिक खाता है और न ही उस व्यक्ति के लिए जो बिल्कुल नहीं खाता; न ही उसके लिए जो अधिक सोता है और न ही उसके लिए जो हमेशा जागता रहता है (6.16)। इसका अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार संतुलित और उचित आचरण करना। बीमारी के समय व्यक्ति का भोजन कम हो जाता है जबकि शारीरिक परिश्रम के बाद भोजन की मात्रा बढ़ जाती है। यह दर्शाता है कि उपयुक्तता समय और स्थान पर निर्भर करती है। अतः इस श्लोक का तात्पर्य है कि उचित आचरण का अर्थ है परिस्थितियों के अनुसार सहज रूप से ढल जाना और प्रवाह के साथ चलना। दान की उपयुक्तता उस व्यक्ति के संदर्भ में भी होती है जिसे दान दिया जा रहा है। यह उसी प्रकार है जैसे परमाणु तकनीक जैसे दोहरे उपयोग (dual-use) वाली तकनीकें रखने वाले देश, उन देशों को यह तकनीक नहीं देते जोउसका दुरुपयोग कर सकते हैं। इसी प्रकार प्राचीन समय में गुरु तब तक किसी शक्तिशाली तंत्र या साधना की शिक्षा नहीं देते थे जब तक उन्हें यह विश्वास न हो जाए कि शिष्य उसका उपयोग समाज के कल्याण के लिए करेगा। ‘कर्तव्य के रूप में दान’ एक जटिल विषय है क्योंकि यह प्रश्न उठाता है कि क्या कर्तव्य है और क्या नहीं। उदाहरण के लिए बीजावरण का कर्तव्य बीज की रक्षा करना है और बाद में स्वयं नष्ट होकर अंकुर को बाहर आने देना। इस प्रकार कर्तव्य के स्वभाव को समझना कोई सरल कार्य नहीं है। श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “जो दान अनिच्छा से, प्रत्युपकार की आशा में या किसी फल की अपेक्षा से दिया जाता है, वह राजसिक दान कहलाता है” (17.21)। “जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य व्यक्तियों को, बिना सम्मान के या तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है, वह तामसिक दान कहा गया है” (17.22)।

1. juli 20264 min