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Gita Acharan

Podcast de Siva Prasad

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Acerca de Gita Acharan

Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.

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Portada del episodio 223. बुराई का फल बुरा ही होता है

223. बुराई का फल बुरा ही होता है

श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)। श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं। यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है। हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।

9 de may de 2026 - 3 min
Portada del episodio 222. शक्ति का दर्प सही नहीं

222. शक्ति का दर्प सही नहीं

श्रीकृष्ण कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति सोचता है, “मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। यह सब मेरा है और कल मुझे इससे भी अधिक मिलेगा (16.13)। मैंने इस शत्रु को मार डाला है और अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा। मैं मनुष्यों में शासक हूँ; मैं भोगी हूँ, मैं पूर्ण, शक्तिशाली और सुखी हूँ (16.14)। मैं धनवान और कुलीन हूँ; मेरे समान और कौन है? मैं त्याग करूँगा, मैं दान करूँगा, मैं आनंद मनाऊँगा।" इस प्रकार, आसुरी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति अज्ञानता से मोहित हो जाते हैं (16.15)। आज की दुनिया में, इसे अक्सर 'सफलता' समझ लिया जाता है। यह अहंकार की भाषा है जो दूसरों से तुलना करने से पनपती है। आसुरी व्यक्ति अहंकार से ग्रसित होता है, जो दूसरों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने में सफलता मिलने पर, शत्रुओं के परास्त होने पर, या उन्नति के शिखर पर पहुँचने पर शासक जैसा अनुभव करता है। ऐसा होने पर अहंकार में वृद्धि होती है। तुलना इच्छाओं को प्रेरित करती है, जिसमें संचय और इंद्रिय तृप्ति की इच्छा भी शामिल हैं। लेकिन इंद्रिय तृप्ति का कोई अंत नहीं है और श्रीकृष्ण इसे अज्ञानजनित मोह कहते हैं। श्रीकृष्ण ने अज्ञान का नाश करने के लिए ज्ञान की तलवार का उपयोग करने के लिए कहा था (4.41) और कहा था कि इस संसार में ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ भी नहीं है। समय आने पर, जिसने योग सिद्ध कर लिया है, वह इसे स्वयं में पा लेता है (4.38)। इसकी कुंजी है सबूरी (धैर्य) के साथ श्रद्धा। हमारी वर्तमान स्थिति चाहे जो भी हो, ज्ञान योग के अभ्यास से हम उपयुक्त समय में ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सार यह है कि जब हम तुलना करते हैं तो स्वयं का अवलोकन करें; एक अच्छे विद्यार्थी की तरह इन प्रवृत्तियों पर प्रश्न करें (4.34), ताकि हम स्वयं को बेहतर बना सकें। श्रीकृष्ण ने पहले आश्वासन दिया था कि योग के अभ्यास में छोटे कदम भी परिणाम देते हैं (2.40)।

29 de abr de 2026 - 3 min
Portada del episodio 221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों

221. साधन और साध्य - दोनों शुद्ध हों

श्रीकृष्ण आसुरी स्वभाव वालों के बारे में आगे कहते हैं, "यह मानते हुए कि यह सारा संसार शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है, ऐसे लोग मृत्युपर्यंत सांसारिक चिंताओं में डूबे रहते हैं (16.11)। सैकड़ों इच्छाओं, काम और क्रोध के बन्धन में बंधे हुए, वे अपनी इंद्रियों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्ण तरीकों से धन संचय करने का प्रयास करते हैं" (16.12)। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध स्वाभाविक है, इस प्रकार वे साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए इंद्रियों पर नियंत्रण भगवद्गीता के प्रमुख उपदेशों में से एक है। जब कोई संचय को लक्ष्य बनाता है, तो उसकी प्रवृत्ति उसे प्राप्त करने की ओर अपनी सारी ऊर्जा लगाने की होती है। इस मार्ग पर, व्यक्ति उक्त लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनाए गए सभी साधनों को उचित ठहराने की कोशिश करता है, चाहे वे साधन नैतिक हों या अनैतिक। इस प्रक्रिया में दूसरों को हड़पना शामिल है - यह संपत्ति या अच्छे काम का श्रेय हो सकता है; यह बाजार में हिस्सेदारी हड़पना या मन में जगह बनाना हो सकता है जिसे स्वार्थी उद्देश्यों के लिए 'दूसरों को प्रभावित करना' कहा जाता है जैसा कि सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) पर किया जाता है। श्रीकृष्ण जमाखोरी को हतोत्साहित करते हैं और जमा करने वालों को चोर कहते हैं (3.12)। वह हमें देने और लेने के प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने जल चक्र का उदाहरण दिया जिसमें वर्षा और वाष्पीकरण के निःस्वार्थ कर्म (यज्ञ) शामिल हैं। इसका मतलब अपने पेशे या कर्मों का त्याग करना नहीं है। श्रीकृष्ण ने पहले हमें कर्मों का त्याग करने के लिए नहीं, बल्कि घृणा का त्याग करने के लिए कहा था। एक बार घृणा का त्याग हो जाए, तो उसका ध्रुवीय विपरीत, यानी आसक्ति या हड़पना, स्वतः ही गायब हो जाएगा। विकास और सुधार प्रकृति का अभिन्न अंग हैं। इस प्रक्रिया में, बेहतर प्रजातियाँ विकसित होती हैं; जीवन की गुणवत्ता समय के साथ बेहतर होती जाती है। सार यह है कि संचय में लिप्त होने के बजाय प्रवाह के साथ आगे बढ़ें। संचय के प्रति यह आसक्ति ही वह बन्धन है जिसे श्रीकृष्ण ने आसुरी व्यक्ति की पहचान बताया है।

23 de abr de 2026 - 3 min
Portada del episodio 220. तर्क से परे

220. तर्क से परे

श्रीकृष्ण ने अस्तित्व की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रकृति और पुरुष का संयोग है, जो दोनों अनादि हैं। गुण और विकार प्रकृति से उत्पन्नहोते हैं (13.20)। जबकि प्रकृति कारण और प्रभाव के लिए जिम्मेदार है, पुरुष उन्हें सुख और दुःख के द्वंद्वों के रूप में अनुभव करता है (13.21)। श्रीकृष्ण ने आगे स्पष्ट किया कि वह नाशवान प्रकृति से अतीत हैंऔर अविनाशी पुरुष से भी उत्तम हैं, इसलिए उन्हें पुरुषोत्तम (परम पुरुष या परमात्मा) कहा जाता है (15.18)। यह पुनरावृत्ति हमें निम्नलिखित श्लोकों को समझने में मदद करेगी। श्रीकृष्ण कहते हैं, “आसुरी स्वभाव वाले लोग कर्म और अकर्म में भेद नहीं कर पाते। उनमें न तो पवित्रता होती है, न आचरण, न सत्य (16.7)। वे कहते हैं कि संसार परम सत्य से रहित है, आधारहीन है, प्रभु से रहित है।यह संसार कामवासना से (स्त्री-पुरुष के) पारस्परिक मिलन से उत्पन्नहुआ है" (16.8)। मूलतः, यह प्रकृति के स्तर पर जीवन जीना है, जहाँ कारण और प्रभाव का प्रभुत्व है; जहाँ तर्क ही हमारे अनुभव की हर चीज को परिभाषित करता है। अगला प्रश्न यह उठता है कि नाशवान प्रकृति के स्तर पर कार्य करने वाले व्यक्ति का आचरण कैसा होगा। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं, “ऐसे विचारों को धारण करके, ये पथ भ्रष्ट आत्माएँ, अल्प बुद्धि और क्रूर कर्मों के साथ, संसार के शत्रु के रूप में इसके विनाश का कारण बनती हैं(16.9)। अतृप्त कामनाओं को धारण किए, पाखंड, अभिमान और अहंकार से युक्त, मोहवश बुरे विचारों से युक्त, ये अशुद्ध संकल्प से कार्य करते हैं (16.10)। संक्षेप में, आसुरी स्वभाव वाले लोग पुरुषोत्तम को समझे बिना प्रकृति के कारण और प्रभाव के स्तर पर जीते हैं। सृष्टि के लिए नर-नारी के मिलन का रूपक तार्किक है। इसी प्रकार, हमारे आस-पास दिखाई देनेवाले कई कार्य और विचार भी इसी तार्किक श्रेणी में आते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम का शुद्ध आनंद तर्क से परे है। यह तर्क के बन्धन से बिना शर्त प्यार (निःस्वार्थ प्रेम) की यात्रा है।

23 de abr de 2026 - 3 min
Portada del episodio 219. बन्धन से मुक्ति

219. बन्धन से मुक्ति

श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी। फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता। विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है। जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।

25 de mar de 2026 - 4 min
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