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Over Gita Acharan
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
219. बन्धन से मुक्ति
श्रीकृष्ण कहते हैं, “तेज (चरित्र का तेज), क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव का न होना और प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होना; ये सब दिव्य प्रवृत्ति से संपन्न लोगों के दैवीय गुण हैं (16.3)। दम्भ, अहंकार, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञानता उस व्यक्ति के लक्षण हैं जो आसुरी प्रवृत्ति के साथ जन्म लेता है (16.4)। संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं- एक वे जो दैवीय गुणों से सम्पन्न हैं और दूसरे वे जो आसुरी प्रवृत्ति के हैं (16.6)। दैवीय प्रकृति मोक्ष प्रदान करती है;जबकि आसुरी गुण निरंतर बन्धन की नियति का कारण होते हैं”(16.5)। चूँकि मुक्ति और बन्धन अनुभवजन्य हैं, इसलिए उनके बारे में कोई भी व्याख्या स्पष्टता प्रदान करने के बजाय भ्रम पैदा करेगी। फँसे हुए बंदर की कहानी हमें बन्धन और मुक्ति के बीच के द्वैत को समझने में मदद करेगी। एक संकरे मुँह वाले सुराही में कुछ मेवे रखे जाते हैं, जिसमें बंदर का हाथ मुश्किल से समा पाता है। बंदर सुराही के मुँह से अपना हाथ अंदर डालता है और मुट्ठी भर मेवे पकड़ लेता है। मुट्ठी भर जाने पर उसका आकार बढ़ जाता है, इसलिए वह सुराही से बाहर नहीं निकल पाता और बंदर सुराही से बंध जाता है। हालाँकि बंदर अपनी बंद मुट्ठी को सुराही से बाहर निकालने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, लेकिन जब तक उसे यह एहसास नहीं हो जाता कि जाल उसने खुद ही बिछाया है, तब तक वह मुक्त नहीं हो सकता। विभाजन और उससे उत्पन्न तुलनाएँ; अतीत में जीना या भविष्य से अपेक्षाएँ; धन, विलासिता, शक्ति, मित्रों, शत्रुओं, काम, शराब या यहाँ तक कि दैनिक दिनचर्या से लगाव, बंदर की मुट्ठी में बंद उन मेवों की तरह हैं जो हमें बाँधते हैं। जहाँ कुछ और बनने या कुछ हड़पने की इच्छा बन्धन है, वहीं स्वयं को विलीन कर अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना मुक्ति है। जीवन हमारे सामने विभिन्न परिस्थितियाँ प्रस्तुत करता है, परंतु जब हम उन्हें उसी प्रकार आत्मसात करना सीख जाते हैं जैसे सागर नदियों को अपने में समाहित कर लेता है (2.70), जहाँ हमारी प्रतिक्रियाएँ उन परिस्थितियों से अप्रभावित रहती हैं; वही वास्तविक मुक्ति है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण द्वाराबताए गए पड़ाव हमारी मुक्ति के मार्ग पर हुई प्रगति को परखने के मार्गदर्शक संकेतक बन सकते हैं।
218. अहिंसा
श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, निन्दा न करना, सभी प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, नम्रता, विनयशीलता, स्थिरता ये सब दैवीय गुण हैं (16.2)। जबकि अहिंसा एक दिव्य गुण है, कुरुक्षेत्र का हिंसक युद्ध एक बड़ी बाधा है जिसे भगवद्गीता को समझने के लिए पार करने की आवश्यकताहै। सबसे पहले, इस विरोधाभास का उत्तर श्रीकृष्ण ने पहले ही दे दियाथा जब उन्होंने अर्जुन से कहा था कि यदि वह सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीत-हार के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखते हुए युद्ध लड़ेगा तो उसे कोई पाप नहीं लगेगा (2.38)। यह आंतरिक संतुलन या समत्व, अहिंसा के अलावा और कुछ नहीं है। अक्रोध (क्रोध से मुक्ति), एक और दैवीय गुण है जो इस आंतरिक संतुलन का परिणाम है। दूसरी ओर, असंतुलन से उत्पन्न कोई भी कार्य हिंसा है। दूसरे, श्रीकृष्ण कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी वह है जो दूसरों के प्रति सुख-दुःख में वैसा ही भाव रखता है जैसा वह स्वयं के लिए रखता है (6.32)। यह ईर्ष्या के बिना दूसरों के सुख को अपना सुख मानना है; यह परपीड़न या व्यंग्य के बिना दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानना है। दूसरों के प्रति ऐसी भावना अहिंसा है। निंदा भी एक प्रकार की हिंसा है जो हम झूठे और अपमानजनक बयान देकर दूसरों पर करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण ने निंदा न करने को एक दिव्य गुण के रूप में शामिल किया। त्याग का एक और दिव्य गुण घृणा का त्याग है (5.3)। श्रीकृष्ण ने पहले दूसरों को स्वयं में और स्वयं को दूसरों में देखने का मार्ग बताया था (6.29-6.30)। यह दर्शाता है कि हममें भी वे अवगुण हैं जिनकी हम दूसरों में आलोचना करते हैं और दूसरों में भी वे अच्छे गुण हैं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। इसे समझना ही सभी प्राणियों के प्रति करुणा और सौम्यता जैसे दिव्य गुणों को प्राप्त करना है। सत्य (सत्यवादिता) का अर्थ है अनुकूल और प्रतिकूल दोनों हीपरिस्थितियों में बिना किसी शर्त के सत्यवादी होना। यह गुण भी हमारेआंतरिक संतुलन की उपज है।
216. भय से पार पाना
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है। भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है। सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)। दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने के लिए, अभय आवश्यक है।
217. दान व्यापार नहीं है
श्रीकृष्ण ने अंतःकरण शुद्धि (आंतरिक पवित्रता), ज्ञानयोग में दृढ़ता, दान, इंद्रियोंपर नियंत्रण, यज्ञ, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन) और सत्यनिष्ठा को कुछ दैवी गुणों के रूप में वर्णित किया है (16.1)। भगवद्गीता में एक सामान्य सूत्र इंद्रियों पर नियंत्रण है। यद्यपि इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, फिर भी वे इच्छाएँ उत्पन्न करके हमें बाँधती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हम मुक्ति के दिव्य मार्ग से भटक जाते हैं। आंतरिक शुद्धता को इससे पहले अध्यात्म कहा गया है और स्वभाव (आंतरिक प्रकृति) के रूपमें परिभाषित किया गया है (8.3)। यद्यपि सभी लोग जन्म के समय शुद्ध होते हैं, फिर भी बाद में समाज और परिवार द्वारा विभाजन के रूप में अशुद्धियाँ थोपी जाती हैं। परिणामस्वरूप, कुछलोगों के लिए मांसाहारी भोजन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन अन्य के लिए यह स्वीकार्य है; चचेरे भाई से विवाह करना कुछ संस्कृतियों में स्वीकार्य है और अन्य में निषिद्ध है; एक ही परमात्माकी प्रार्थनाएँ बिल्कुल भिन्न हैं और कभी-कभी विरोधाभासी प्रतीत होती हैं; यह सूची अंतहीन है। शुद्धता प्राप्त करना इन विभाजनों को दूर करने के अलावा और कुछ नहीं है। श्रीकृष्णने इसे प्राप्त करने के एक साधन के रूप में स्वाध्याय का उल्लेख किया है। पहले उन्होंने हमें यज्ञ की तरह स्वाध्याय करने की सलाह दी थी (4.28) क्योंकि यज्ञ निःस्वार्थ कर्म है। आत्म-अध्ययन का उपयोग ज्ञान योग में दृढ़ता के एक अन्य दिव्य गुण के लिए भी किया जा सकता है जहाँ हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह खुद से प्रश्न करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ने दान को एक और दिव्य गुण के रूप में कहा है। सबसे पहले, कोई भी संचय आसुरीस्वभाव का हिस्सा है और स्वयं को खाली करना दिव्य स्वभाव का एक हिस्सा है। दूसरे, यह दान देने की गुणवत्ता को विकसित करने के बारे में है न कि दान की मात्रा के बारे में। दान एक शब्द, समय, आश्वासन या कोई भौतिक चीज हो सकती है। यह जो भी हमारे पास है या जिसकी हम क्षमता रखते हैं उसे देने की आदत डालने के बारे में है। तीसरा, यह बदले में कुछ भी अपेक्षा किए बिना शुद्ध प्रेम है क्योंकि अपेक्षा दान को एक व्यवसाय बना देगी।
215. खुला रहस्य
भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय को 'पुरुषोत्तम योग' कहा जाता है। यह शीर्षक निम्नलिखित श्लोक से लिया गया है जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं, "मैं नाशवान कार्य प्रकृति (सृष्टि) से परे हूँ और अविनाशी आत्मा (कूटस्थ) से भी उत्तम हूँ। इसलिए, वेदों और जगत में मुझे पुरुषोत्तम कहा गया है" (15.18)। एक बार जब जागरूकता स्थापित होने लगती है, तो हमारे सामने दो मूलभूत प्रश्न आते हैं: हमें क्या करना चाहिए और हमें क्या जानना चाहिए? श्रीकृष्णने पहले प्रश्न के उत्तर में हमारे सभी कर्मों को उनको अर्पण करके हमें ममत्व रहित (निर्-मम) और आशा रहित (निर्-आशा) रहने को कहा था (3.30)। श्रीकृष्ण दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं, "जो ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वास्तव में वे सब कुछ जानते हैं। वे पूर्ण रूप से मेरीपूजा करते हैं" (15.19)। हालाँकि यह एक सरल और खुला रहस्य है, 'सब कुछ जानना' तब सम्भव होता है जब जानना अस्तित्वगत स्तर पर होता है। श्रीकृष्ण ने हमें हर समय उनका स्मरण करने का निर्देश दिया था, और अब वे हमें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ उनकी आराधना करने के लिए कहते हैं। हर क्षण और अपनी प्रत्येक कोशिका के साथ उनकी आराधना करना असम्भव प्रतीत होता है। इस पहेली की कुंजी पहले दी गई है, 'सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सभी प्राणियों को देखना और उन्हें सर्वत्र देखना' (6.29 और6.30)। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन करते हुए कहते हैं, "मैंने तुम्हें वैदिक ग्रंथों का अति रहस्ययुक्त (गोपनीय) शास्त्र समझाया है। इसे समझकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है और अपने प्रयासो में परिपूर्ण हो जाता है" (15.20)। इसका तात्पर्य यह है कि इस संसार में इस ज्ञान को प्राप्त करना ही हमारा परम कर्तव्य है। श्रीमद्भागवत पुराण में, श्रीकृष्ण ने उपरोक्त श्लोकों में जो कहा है, उनके साक्षात्कार करने का एक सरल मार्ग बताया है। वे कहते हैं कि जब हम किसी चोर, गधे या शत्रु को देखें, तो उनमे हम आत्मतत्त्व रूप श्रीकृष्ण को ही महसूस करें। निश्चित रूप से, यह समझना आसान है, लेकिन आचरण में लाना कठिन है। मूलतः, सबके पीछे वही पुरुषोत्तम हैं।
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