Gita Acharan
भगवद्गीता में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो समझने में तो सरल हैं, पर उन्हें जीवन में उतारना अत्यन्त कठिन है। दूसरी ओर, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना ही चुनौतीपूर्ण है। ऐसा ही एक विषय है -‘नियत कर्म’ (निर्धारित या अनिवार्य कार्य)। यह प्रश्न सदा से मनुष्य को उलझन में डालता रहा है कि हमारे नियत या अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं, किन बातों को सहना चाहिए और किन्हें नहीं। विभिन्न ज्ञानी महापुरुषों के ग्रंथों और उपदेशों में इस विषय पर भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं जो बाहर से देखने पर परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होती हैं। स्वयं हमारी समझ भी उम्र और अनुभव के साथ बदलती रहती है। भूख लगने पर भोजन करना और प्यास लगने पर पानी पीना, ये प्राकृतिक नियत कर्म हैं। किंतु जीवन इतना सरल नहीं है; यह अनेक जटिल परिस्थितियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने पहले ही कहाथा कि यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म और जटिल है और यहाँ तक कि ज्ञानीजन भी कर्म और अकर्म (अक्रियता या निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। वे आगे कहते हैं कि कर्म का स्वरूप समझना अत्यन्त कठिन है। अतः नियत या उचित कर्म को भली-भांति समझने के लिए विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म, इन दोनों के स्वरूप को भी जानना आवश्यक है (4.17)। त्याग (संन्यास) और नियत कर्म के संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “नियत कर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। मोहवश किया गया ऐसा त्याग तामसिककहा गया है” (18.7)। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट के भय से दुःखदायक कर्म का परित्याग करता है, वह राजसिक त्याग करता है; ऐसा त्याग न तो लाभदायक होता है और न ही आध्यात्मिक रूप से उन्नति देने वाला” (18.8)। जो व्यक्ति आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग करके नियत कर्म करता है, उसका त्याग सात्विक त्याग कहा जाता है” (18.9)। इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने पहले कहा कि कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञकरते हैं; अन्य लोग ब्रह्म (परमात्मा) की अग्नि में आहुति देकर बलिदान को ही बलिदान करते हैं। मूलतः यह मन से त्याग के भाव का भी त्याग करना है। यह गुणातीत अवस्था है जो गुणों से परे हो गया है।
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